केशव मोहन मिश्रा
चुनाव आते ही राजनीतिक पार्टियां अपना रंग दिखाना शुरू कर देती हैं। सभी पार्टियां किसी न किसी मुद्दे, वादे, जनता के प्रति दया लेकर सुर्खियां बटोरने की कोशिशें करने लगती हैं।
2019 के चुनाव नजदीक आ चुके हैं। सभी पार्टियां अपनी क्रिया- प्रतिक्रिया में गति प्रदान कर रही हैं। एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का सफर शुरू हो चुका है। पार्टियों ने चुनाव जीतने के लिए मंदिर और भगवा का सहारा लेना शुरू कर दिया है। आज तक सवर्णों और हिन्दुओं को दरकिनार करने वाली पार्टियां भी राम और भगवा की शरण मे पहुँच रही हैं। आलम ये है कि अखिलेश यादव ,राहुल गाँधी से लेकर कई दिग्गजों के सर पर भगवा पगड़ी देखने को मिल रही है। इसका सीधा सम्बंध हिंदुत्व की शरण में जाकर पार्टियां अपना बेड़ा पार करने में लगी हैं। वहीं बीजेपी ने भी राम नाम का सहारा और राम मंदिर पर चुप्पी तोड़ने का काम शुरू कर दिया है, जिससे ये बात तो बिल्कुल सही है कि विपक्षी दल पर इसका गहरा असर पड़ सकता है। अब देखना ये है क्या बीजेपी सरकार राम मंदिर पर 2019 चुनाव से पहले कोई ठोस कदम उठाएगी? क्या वह मंदिर के पक्ष में कोई निर्णय लेती है? हालांकि अब किसी भी राजनीतिक पार्टी को राम मंदिर पर कोई निर्णय लेना सरल तो नहीं होगा, लेकिन फिर भी सभी राजनीतिक पार्टियों की रोटी जो इसी मुद्दे पर सिक रही है। कारण यह भी है मामला सुप्रीम कोर्ट में हैं।
फिलहाल विपक्षियों के बढ़ते हुए रामप्रेम ने ये तस्वीर तो बिल्कुल साफ कर दी है कि सवर्ण और भगवा अपनी स्थिति परिवर्तन करने में सक्षम हो चुके हैं। तभी आज सभी पार्टियां सवर्णों की शरण में आने के लिए मजबूर होती दिखाई दे रही हैं। वहीं सभी राजनितिक दल 2019 चुनाव के लिए अपनी कमर कस चुके हैं।

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